Sunday, September 17, 2023

देवनागरी लिपि

 

देवनागरी लिपि

हिन्दी’ और ‘संस्कृत’ देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। ‘देवनागरी’ लिपि का विकास ‘ब्राह्री लिपि’ से हुआ, जिसका सर्वप्रथम प्रयोग गुजरात नरेश जयभट्ट के एक शिलालेख में मिलता है। 8वीं एवं 8वीं एवं 9वीं सदी मे ंक्रमशः राष्ट्रकूट नरेशों तथा बड़ौदा के ध्रुवराज ने अपने देशों में इसका प्रयोग किया था। महाराष्ट्र में इसे ‘बालबोध’ के नाम से संबोधित किया गया।

देवनागरी लिपि पर तीन भाषाओं का बड़ा महत्वपूर्व प्रभाव पड़ा। 

(i) प्रभाव: पहले देवनागरी लिपि में जिहामूलीय ध्वनियों को अंकित करने के चिन्ह नहीं थें, जो बाद में फारसी से प्रभावित होकर विकसित हुए- क, ख, ग, ज, फ।

(ii) बांग्ला प्रभाव: गौल-गौल लिखने की परम्परा बांग्ला लिपि के प्रभाव के कारण शुरू हुई।

(iii) रोमन प्रभाव: इससे प्रभावित हो विभिन्न विराम चिन्हों, जैसे- अल्प विराम, अर्द्ध विराम, प्रश्नसूचक चिन्ह, विस्मयसूचक चिन्ह, उद्धरण चिन्ह एव पूर्ण विराम में ‘खड़ी पाई’ की जगह ‘बिन्दु (Point) का प्रयोग होने लगा।

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ :

इसके ध्वनि क्रम पूर्णतया वैज्ञानिक हैं।
प्रत्येक वर्ग में अघोष फिर सघोष वर्ण हैं।
वर्गों की अंतिम ध्ववियाँ नासिक्य हैं।
छपाई एवं लिखाई दोनों समान हैं।
ह्रस्व एवं दीर्घ में स्वर बँटे हैं।
निश्चित मात्राएँ हैं
उच्चारण एवं प्रयोग में समानता है।
प्रत्येक के लिए अलग लिपि चिन्ह है।

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